जवाहर नवोदय विद्यालय उडुपि
तृतीय चक्र परीक्षा 2009-10
कक्षा : दस विषय : हिंदी
समय : १ घंटा दिनांक :29/08/2009
खंड ’क ’
प्रश्न १ निम्नलिखित गद्यांश को पढकर संबंधित प्रश्नों का उत्तर दीजिए Read the rest of this post »
जवाहर नवोदय विद्यालय उडुपि
तृतीय चक्र परीक्षा 2009-10
कक्षा : दस विषय : हिंदी
समय : १ घंटा दिनांक :29/08/2009
खंड ’क ’
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जवहार नवोदय विद्यालय उडुपि
तीसरा ईकाइ परीक्षा २००९-१०
कक्षा : सात दिनांक २९/८/२००९
समय : १घंटा कुल अंक: ४०
१ निर्देशानुसार लिखिए २x१०=२०
१) सम्राट और नटखट शब्दों का अर्थ लिखिए ।
२) सेवक और नायक शब्दों का लिंग बदलिए ।
३) धीरे-धीरे और हरे-भरे शब्दों से एक-एक वाक्य बनाइए ।
४) सु और अनु उपसर्ग से एक-एक शब्द की रचना कीजिए ।
५) राष्ट्रीयता और ससुराल शब्दों के प्रत्यय अलग कीजिए ।
६) देवालय और पुस्तकालय के संधि विच्छेद कीजिए । Read the rest of this post »
तीसरा चक्र परीक्षा 2009-10
कक्षा : नवमं विषय : हिंदी
समय : १ घंटा दिनांक:२९/८/२००९
प्रश्न १ सूचना के अनुसार लिखिए ।
१) समनार्थी अर्थवाले शब्द लिखिए । १) वादी २) शती ०२
२) उल्टे अर्थवाले शब्द लिखिए । १) होश २) खुश Read the rest of this post »
कक्षा दस के लिए पाँच नमूना पत्रों को बरह में टाईप किया गया है
अभ्यास प्रश्न पत्र १
पाठ योजना
कक्षा : सात
दिनांक : २० आगस्त २००९ से ३१आगस्त २०१० तक
पाठ का नाम : काबुलीवाला ।
शैक्षणिक उद्देश्य :-
१ सामान्य उद्देश्य :
१) छात्रों में कहानी पाठ के प्रति अभीरुचि उत्पन्न करना ।
२) छात्रों में विचाराभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करना ।
३) छात्रों में शब्द भंडार की वृद्धि करना ।
४) छात्रों में विचाराभिव्यक्ति की क्षमता को उत्पन्न करना ।
२ विशिष्ट उद्देश्य :
१) छात्रों को मनोवैज्ञानिक कहानी से परिचित कराना।
२) छात्रों को अपने परिवेश के लोगों से स्नेह रहने की योग्यता का विकास कराना ।
३) छात्रों में काबुलेवाले के बारे में फैली अफवाहओं को दूर करने की कोशिश कराना ।
४) छात्रों को बडों के प्रति आदर सूचक बातें करने पर अधिक जोर देना ।
५) छात्रों को मुहावरों और लोकोक्तियों से आवगत कराना ।
३ सहायक सामग्री :
निर्धारित पुस्तकें दूर्व भाग २ तथा लेखक रविंद्र नाथ टैगोर का भाव चित्र , शामपट चाँक एंव चार्ट , कबुलीवाला सीनेमा आदि ।
४ प्रस्तुतीकरण :
प्रस्तुत पाठ में अध्यापक विद्यार्थियों को समझाते है कि मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, “बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है।
मेरा घर सड़क के किनारे है। एक दिन मिनी मेरे कमरे में खेल रही थी। अचानक वह खेल छोड़कर खिड़की के पास दौड़ी गई और बड़े ज़ोर से चिल्लाने लगी, “काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!” Read the rest of this post »
पाठ योजना
कक्षा : सात
दिनांक :१० अगस्त २००९ से २० अगस्त २००९ तक
पाठ का नाम : विश्वेश्वरैया ।
शैक्षणिक उद्देश्य :-
१ सामान्य उद्देश्य :
१) छात्रों में गद्य पाठ के प्रति अभीरुचि उत्पन्न करना ।
२) छात्रों में विचाराभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करना ।
३) छात्रों में शब्द भंडार में वृद्धि करना ।
४) छात्रों में भाषा सीखने एवं उनकी संपप्रेषण-क्षमता का विकास करना ।
५) महान इंजिनियर डाँक्टर सर विश्वेश्वरैय के जीवन चरीत्र के बारे में परिचीत कराना ।
२ विशिष्ट उद्देश्य :
१) छात्रों को प्रकृति के प्रति से प्रेम रखने की भावना से परिचित कराना।
२) छात्रों को धरती के सामान्य स्रोत को इस्तेमाल करने की भावना को समझाना ।
३) छात्रों में गरीबों के कारण पर ध्यान दिलाने की कोशिश कराना ।
४) छात्रों को पाठ सम्बंधि लेखक की चिंतित विषयों मनन कराना ।
५) छात्रों को बढती आबादी से पर्यावरण पर पढ रहे दूष-परिणाम से आवगत कराना ।
३ सहायक सामग्री :
निर्धारित पुस्तकें दूर्व भाग २ तथा विशवेश्वरैया का भाव चित्र , शामपट चाँक एंव चार्ट आदि ।
४ प्रस्तुतीकरण :
प्रस्तुत पाठ में अध्यापक विद्यार्थियों को समझाते है कि छ वर्षिय बालक विश्वेश्वरैया प्रकृति के मनोहर दृश्य को निहार रहा था । वह मन ही मन में सोच रहा था कि प्रकृति में सहज रूप की शक्ति है । उसके प्रकाश के कारण ही सब कुछ विद्यमान है । एक औरत को देखकर वह यह विचार करता है कि वह फटी साडी क्यों पहनती है ? , वह अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजती ? गरीबों का करण क्या है ?आदि Read the rest of this post »
पाठ योजना
कक्षा : दसमं
दिनांक :२३ अगस्त २००९ से २७ अगस्त २००९ तक
पाठ का नाम : अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले ।
शैक्षणिक उद्देश्य :-
१ सामान्य उद्देश्य :
१) छात्रों में गद्य पाठ के प्रति अभीरुचि उत्पन्न करना ।
२) छात्रों में विचाराभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करना ।
३) छात्रों में शब्द भंडार में वृद्धि करना ।
४) छात्रों में भाषा सीखने एवं उनकी संपप्रेषण-क्षमता का विकास करना ।
२ विशिष्ट उद्देश्य :
१) छात्रों को प्रकृति के अन्य प्राणी से प्रेम रखने की भावना से परिचित कराना।
२) छात्रों को धरती से सब जीव-जंतु को बराबर अधिकार रखने भावना का समझाना ।
३) छात्रों में बढती आबादी पर ध्यान दिलाने की कोशिश कराना ।
४) छात्रों को पाठ सम्बंधि लेखक की चिंतित विषयों मनन कराना ।
५) छात्रों को बढती आबादी से पर्यावरण पर पढ रहे दूष-परिणाम से आवगत कराना ।
३ सहायक सामग्री :
निर्धारित पुस्तकें स्पर्श भाग २ तथा लेखक निदा फाजली का भाव चित्र , शामपट चाँक एंव चार्ट आदि ।
४ प्रस्तुतीकरण :
प्रस्तुत पाठ में अध्यापक विद्यार्थियों को समझाते है कि अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले पाठ को संक्षिप्त में जैसे – सुलेमान की करुणा: एक बार अपने घोडों की टाप से रास्ते में जाने वाली चिंटियाँ डर गई थी और राजा ने उन्हे धैर्य दे कर सुरक्षित पहुँचाया था ।
महाकवि अयाज के पिता तथा नूह का प्रसंग : कवि आयज के महान कार्य जैसे चिंटा को उसके घर छोडना और पैगंबर नूह की चर्चा एक कुत्ते से हुई और जिस विचार से वह कई दिनों तक पछताता रहा । Read the rest of this post »
गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दिया बताय॥
सिष को ऐसा चाहिए, गुरु को सब कुछ देय।
गुरु को ऐसा चाहिए, सिष से कुछ नहिं लेय॥
कबिरा संगत साधु की, ज्यों गंधी की बास।
जो कुछ गंधी दे नहीं, तौ भी बास सुबास॥
साधु तो ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ उडाय॥
गुरु कुम्हार सिष कुंभ है गढ-गढ काढै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर मारै चोट॥
कबिरा प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय।
रोम रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय॥
जल में बसै कमोदिनी, चंदा बसै अकास।
जो है जाको भावता, सो ताही के पास॥ Read the rest of this post »
मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्व के मामले में वह जल्दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।
मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल के थे। उन्हें मेरी तम्बीह और निगरानी का पूरा जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्म को कानून समझूँ।
वह स्वभाव से बडे अघ्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्तों, बल्लियो की तस्वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्द या वाक्य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्याम, श्रीयुत राघेश्याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्टा की कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी। Read the rest of this post »