छात्रावास अध्ययन से लाभ
आज पढाई को ले कर बच्चों के माता-पिता को काफी परेशान है । परिवार के सदस्य यही चाहते है कि अपना बच्चा होशियार हो और खानदान का नाम रोशन करे । बडी-बडी उमिदें रखकर लाखों रुपए का खर्च कर के प्रतिष्ठीत जानी– पहचानी स्कूलों में अध्ययन करवाते है । ऐसी स्कूलों में पढाई करवाना अपना इज्ज्त का सवाल समझते है । वैसे ही प्रतिष्ठत संस्था भारत सरकार द्वारा चलाई जानेवाली एंव मुप्त शिक्षा देनेवाली संस्था जवाहर नवोदय विद्यालय उदुपि है । ऐसी दिशा में मैं “ छात्रावास अध्ययन से लाभ ” कुछ बातें व्यक्त कर रहा हूँ । यह मेरी व्यक्तिगत विचार नहीं है , बल्की जिन छात्तों ने मेरे पास अध्ययन किए उनिकी मुखार से निकली जो दो बातें हैं , उनिको साफ और सुंदर ढंग से उतारने की कोशिश कर रहा हूँ ।
मेरा अध्यापन कार्य लगातार गत बारह साल से नवोदय विद्यालय उडुपि केंद्र सरकार द्वारा चालाई जानेवाली प्रमुख संस्था में चल रहा है । मेरा अनुभव के विचार और मेरे छात्रों का अनुभव से जो कुछ छात्रवास अध्यापन तथा अध्ययन के क्षेत्र से प्राप्त हुआ , उसिका सार सविस्तार है । हम बच्चों को अपने घर में लाड-प्यार से पाले – पोसे जाते हैं । वहाँ दूसरों से मिलजुलकर रहने का मौका नहीं मिलता । जो अपने घर में अपने परिवार के लोगों के साथ ही जीवन बिताता है, उसे अगर किसी कारण से मजबूर होकर अन्य स्थान पर जाना पडे तो वह एकदम परेशान होने लगता है । जो छात्रवास में रह चुका है वह दूसरों के साथ आसानी से हिल-मिलकर रहने लगता है ।
सबके साथ हिल मिलकर रहने से सभी भेद-भाव दूर हो जाते है और अनुशासन का पाठ छात्रों को मिलता है । यही नहीं छात्रवास की व्यवस्था के लिए छात्रों से ही पदाधिकारी भी बनाये जाते है , जिससे नेतृत्व की भावना अपने आप विकसित होती जाती है । छात्र आज्ञाओं का पालन करना सीख जाते है और आज्ञाएँ देना भी । जो दूसरों की आज्ञाओं का पालन करता है वही दूसरों को आज्ञाएँ दे भी सकता है । यह सफल नेता का लक्षण है । छात्रवास में समय पर सारे काम करने पडते है । समय की पाबंदी का ख्याल रखना पडता है । समय के मूल्य को समझने की जरुरत नहीं है । हाँ ! हम तो जानते हैं कि जो समय की परवाह नहीं करता , उसकी परवाह समय भी नहीं करता । इस छात्रवास में रहने से किसी प्रकार की हानियाँ नहीं हैं । अमीर – गरीब , जाति – पाँति और उँच – निच का कोई भेद – भाव नहीं होता है । खुद का काम करना एवं मित्रों के साथ अपनी जटिलताओं का समस्य निवारण कर लेता है । सदन अध्यापक के हाथों में छात्र बुरे विचारों से दूर रहता है । उनकी देख रेख कुछ बडे लडकों से भी हो जाती है ।
आजकल का जीवन बहुत अस्त-व्यस्त रहता है । माता-पिता के पास फुरसत ही नहीं रहती कि वे अपने बच्चों की शिक्षा-दिक्षा पर ध्यान दे सकें । छात्रवास में अध्ययन के लिए अधिक समय मिलता है, देख-रेख भी अच्छी होती हैं ।
लेनिन ने एक बार कहा था कि “ विद्यार्थी का पहला कर्तव्य है अध्ययन करना , दूसरा कर्तव्य है अध्ययन करना और तीसरा कर्तव्य है अध्ययन करना ” । इसलिए छात्रों का लक्ष्य पडना ही होना चाहिए । उसी पर ध्यान देना चाहिए । यदि कोई बच्चा बिमार पड जाता है तो सदन अध्यापक और अन्य साथी से उनका तरकिब अधिक रुप से की जाती है । अंत मैं यही कहना चाहता हूँ कि अध्ययन क्षेत्र में छात्रवास अध्ययन ही सबसे अच्छी और श्रेष्ठ है । इस अवसर को कोई छात्र न खोए ।
उन्मुक्त said,
May 9, 2007 @ 2:52 pm
शायद आप ठीक कहते हैं। क्या करूं मुझे इसका सौभाग्य नहीं मिल पाया।
Ramesh Nayak said,
June 21, 2007 @ 6:55 am
कोई बात नहीं सौभाग्य का रास्ता आपके सामने है , जो आप अपने बच्चों की पढाई ऐसे माहोल में करवा सकते है ।
Nitin Bagla said,
July 10, 2007 @ 5:30 am
रमेश जी,
बहुत दिन बाद वापस उडुपी हिन्दी पत्रिका पर आना हुआ। देख कर मन प्रसन्न हुआ कि यहाँ नियमित रूप से कुछ न कुछ लिखा जा रहा है।
चूंकि मेरी पूरी शिक्षा नवोदय विद्यालय में हुई है, और नवोदय में बिताये ७ साल अपने जीवन के बेहतरीन वर्षों में से मानता हूँ, आपकी बातों से सहमत हूँ।
फिर भी एक बात हैं, जहाँ मुझे लगता है कि छात्रावास…खासकर नवोदय में रहने से मुझे कुछ नुकसान हुआ (हालाँकि ये फायदों कि तुलना में कुछ भी नही, पर अगर इन पर ध्यान दिया जाये, या हो सकता है अब दिया जाता हो, तो काफी फर्क पड सकता है)। नवोदय में रहने से हम ७ साल तक बाहरी दुनिया से बिल्कुल कटे रहे। परिवार, समाज क्या होता है, जाना ही नही। नवोदय चूंकि अपने आप में एक इकाई था, अतः उसकी जरूरत भी नही पडी…लेकिन वहां से निकलने के बाद कफी समय तक ये कमी सालती रही।