नवोदय अध्यापकों के लिए पाठ योजना कबीर की साखी और पत्र लेखन कक्षा दस
June 13, 2007
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पाठ योजना
कक्षा : दसमं
दिनांक :१ जून २००७ से १० जून २००७
पाठ का नाम : कबीर की साखी और पत्र लेखन ।
शैक्षणिक उद्देश्य :-
१ सामान्य उद्देश्य :
१) छात्रों में काव्य के प्रतिर रुचि उत्पन्न करना ।
२) छात्रों को सस्वर कविता वाचन का अभ्यास कराना ।
३) छात्रों में भावानुभूति तथा सौंदर्यानुभूति का विकास करना ।
४) छात्रों को रचाना के द्वारा औपचारिक पत्र से अवगत कराना ।
२ विशिष्ट उद्देश्य :
१) छात्र काव्य के भावों को बोधगम्य करके अपने शब्दों में प्रस्तुत कर सकेंगे ।
२) छात्र बाह्याडंबरों से दूर रहने का प्रयास करेंगे ।
३) छात्र भाव – सौंदर्य और शिल्प सौंदर्य को समझ सकेंगे ।
४) छात्र ईश्वर की सर्वव्यापकता के संदेश को ग्रहण कर सकेंगे ।
५) छात्र ओपचारिक पत्रों से परिचित हो सकेंगे ।
३ सहायक सामग्री :
निर्धारित पुस्तकें स्पर्श भाग २ तथा संत कवि कबीर का भाव चित्र , व्याकरण , शामपट चाँक एंव चार्ट आदि ।
४ प्रस्तुतीकरण :
सर्वप्रथम विद्यार्थियों को कबीरदास का परिचय देते हुए उनके काव्य पाठ ’ साखी ’ का भाव एंव व्याख्यान निम्नलिखित रुप से बताया जाएगा ।
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोइ ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौ सुख होइ ॥
व्याख्यान :- ऐसी वाणी बोलना चाहिए जिसमें मन का अहंकार न हो , ऐसी वाणी वक्ता के शरीर को शीतलता देती है और श्रोता को सुख प्रदान करती है ।
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि ।
ऐसी घटी घटी राँम है, दुनियाँ देखै नाहिँ ॥
व्याख्यान :- मृग की नाभी में कस्तूरी रहती है किन्तु वह उसे जंगल में ढूँढता है । इसी तरह हर देह – घट में राम विराजित हैं किन्तु संसारी लोग उसे देख नहीं पाते और उसकी तलाश तीर्थदि में करते हैं ।
जब मैं था तब हैरि नहीं, अब हरि है मैं नाँहि ।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि ॥
व्याख्यान :-जब तक अहंकार था तब तक ईश्वर से परिचय नहीं हो सका । अहंकार या आत्मा के भेदत्व का अनुभव जब समाप्त हो गया तो ईश्वर का प्रत्यक्ष साक्षात्कार हो गया । ’मैं ’आत्मन का अलग अहसास खत्म हो जाने के बाद , एकमात्र सत्ता ब्रह्मा का अनुभव शेष रहता है । बूँद का अस्थित्व यदि समुद्र में विलिन हो गया तो बूँद भी समुद्र ही हो जाती है । शरीर के भीतर जब परम-ज्योति रूपि दीपक का प्रकाश हुआ तो अज्ञानान्धकार – जनित अहं स्वयं नष्ट हो गया । दीपक का तात्पर्य ज्ञान भी हो सकता है । ज्ञान के होने पर ’सर्व खल्विदं ब्रह्मा ’ की भावना प्रबल हो जाती है ।
सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै ।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै ॥
व्याख्यान :- कबीरदास कहते है कि सभी खाकर अज्ञान की निशा में सो रहे हैं । एक मात्र कबीर दुखी हैं जो जागते हुए रो रहे हैं ।
कबीर को सारा संसार मोह ग्रस्त दिखाई देता है । वह मृत्यु के छाया में रहकर भी सबसे बेखबर विषय-वासनाओं को भोगते हुए अचेत पडा है । कबीर का अज्ञात दूर हो गया है । उनमें ईश्वर के प्रेम की प्यास जाग उठी है । सांसारिकता से उनका मन विमुख हो गया है । उन्हे दोहरी पीडा से गुजरना पड रहा है । पहली पीडा है, सुखी जीवों का घोर यातनामय भविष्य , मुक्त हिने के अवसर को व्यर्थ में नष्ट करने की उनकी नियति । दूसरी पीडा भगवान को पा लेने की अतिशय बेचेनी । दोहरी व्यथा से व्यथित कबीर जाग्रतावस्था में है और ईश्वर को पाने की करुण पुकार लगाए हुए है ।
बिरह भुवंगम तन बसै , मंत्र न लागै कोइ ।
राम बियोगी ना जिवै , जिवै तौ बौरा होइ ॥
व्याख्यान :- कबीरदास कह्ते है कि विरह का सर्प शरीर के अंदर निवास कर रहा है , जिस पर किसी तरह का मंत्र लाभप्रद नहीं हो पा रहा है । इसलिए राम से वियुक्त आत्मा जीवित नहीं रह पाती, ओर यदि जीवित रह्ती भी है तो वह पागल हो जाती है ।
सामन्यत : साँप बाह्य अंगों को डसता है जिस पर मंत्रादि कामयाब हो जाते हैं किन्तु राम का विरह सर्प तो शरीर के अंदर प्रविष्ट हो गया है, वहाँ वह लगातार डसता रहता है । इसलिए कोई मंत्र – तंत्र के प्रभाव का कोई अर्थ ही नहीं है । राम का वियिगी उस तरह से नहीं जीता , जैसे सामान्य आदमी जीते हैं । वह तो जीवन्मृत हि जाता है । उसके व्यवहार भी संसार के व्यवहार से मेल नहीं खाते , इसीलिए उसे पागल समझा जाता है ।
निंदक नेडा राखिए आँगन कुटी बंधाई ।
बिना सांबण पांणी बिना, निरमल करै सुभाइ ॥
व्याख्यान :- कबीर कहते है कि निंदकों को आँगन में कुटिया बनाकर अपने निकट रखा जाए जिससे बिना साबुन और पानी के स्वभाव निर्मल होता रहेगा ।
पास स्थित निंदक दोष निकालेगा और निन्द्य व्यक्ति अपना परिमार्जन करता जाएगा । उस तरह वह बिना साबुन और पानी के ही निर्मल हो जाएगा ।
पोथी पढि-पढि जग मुवा, पंडित भया न कोइ ।
एकै आखिर पीव का, पढै सो पंडित होइ ॥
व्याख्यान :- सारे संसार के लोग पुस्तक पढते-पढते मर गये कोई भी पंडित ( वास्त्विक ज्ञान रखने वाला ) नहीं हो सका । परन्तु जो अपने प्रिय परमात्मा के नाम का एक ही अक्षर जपता है (या प्रेम का एक अक्षर पढता है ) वही सच्चा ज्ञानी ( पंडित ) होता है । वही परमात्मा का सच्चा भक्त होता है ।
हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराडा हाथि ।
अब घर जालौं तासका, जे चले हमारे साथि ॥
व्याख्यान :- मैंने ज्ञान – भाक्ति की जलती हुई लकडी हाथ में लेकर अपना विषय वासनाओं का घर जला डाला अब मैं उसका भी विषयवासनाओं का घर जला सकता हूँ जो मेरा साथ देने के लिए तैयार हो ।
मुराडा देशज शब्द है जिसका अर्थ है जलती लकडी ।
इसके बाद पत्र लेखन की महता एंव आवश्यकता के साथ औपचारिक पत्र के प्रकार और नमूना पत्र लिखाकर जानकारी दी जाएगी ।
५ कठिन शब्दार्थ :
बाँणी = बोली, आपा=अहं , कुंडली=नाभी , घटी-घटी=कण-कण ,पीव=प्रिय आदि ।
६ विद्यार्थी – क्रियाएँ :
१) आदर्श वाचन को सुनकर तथा अनुकरण वाचन के द्वारा साखी का अर्थ तथा भाव ग्रहण करेंगे ।
२) शामपट पर देखकर विभिन्न शब्दों के अर्थ तथा उदाहरण लिखेंगे ।
३) जिज्ञासा समाधान हेतु प्रश्न पूछ सकते है ।
४) दिए गए अभ्यास कार्य तथा गृहकार्य को पूर्ण करेंगे ।
५) मौखिक रुप से साखी के भाव बता सकेंगे ।
७ मूल्यांकन :
१) कबीर की साखी को मौखिक रुप से उसका भाव बोल पाएँगे ।
२) प्रश्न अभ्यास के प्रश्न पूछकर ।
३) कठिन शब्दों के अर्थ पूछकर ।
४) चक्र परीक्षा द्वारा ।
८ गृहकार्य :
कबीर की साखी की भाव और पद्य पाठ के प्रश्न लिख्नना तथा औपचारिक पत्र के पाँचो नमूनों का पहला अधिन्यास लिखना ।