हमारी संस्कृति

          पिछले वर्ष मै अपने साथियों के साथ प्रगति मैदान में गया । वहाँ अंतराष्ट्रीय व्यापार मेले का आयोजन किया गया था । पहले कभी मैंने यह मेला नहीं देखा था । इस बार गया तो वापस आने का दिल ही नहीं कर रहा था । बहुत कुछ अनदेखा रह गया था । दूर से ही मेले का प्रतिक-चिह्न विशाल गुब्बारा दिखाई दे रहा था । प्रगति मैदान में प्रवेश के लिए कई द्वार थे । हर द्वार पर टिकट लेने वालों की लंबी-लंबी कतारे लगी थी । हम सब अंदर गए तो चकित रह गए । चारों ओर कलात्मक वस्तुओं की साज – सज्जा । अनेक राज्यों और बाहरी देशों के मंडप सजे हुए थे ।

       हम सबसे पहले जिस मंडप मेंगए वह अमेरिका का था । वहाँ नविनतम तकनिक की इतनी सारी चीजें थी कि हम हैरान रह गए । विभिन्न सामानों के साथ अमेरिका की प्रगती के विषय में भी दर्शाया गया था । सभी कुछ इतना अनुशासित था कि लगा किसी नई दुनिया में आ गए हों । कंप्यूटर , रोबोट , मशीने आदि ढेरे सामान वहाँ रखे थे । उसके बाद हम जर्मनी के मंडप में गए । उस मंडप में भी आकर्षक सामान भरा पडा था । टी.वी.वाँशिंग मशीन ,सिलाई मशीन , प्रैस आदि बहुत सारे सामान हमें पसंद आए ।

      एक तरफ एक भवन में देशी-विदेशी फोन और मोबाइल फोनों की प्रदर्शनी लगी थी । एक से बढकर एक आकर्षक फोन देखकर आँखें फटी-सी रह गई । हम इतने प्रभावित हुए कि सभी ने एक-एक मोबाइल फोन की खरीद की । घडी देखी तो दोपहर के दो बज रहे थे। अभी कुछ भी नहीं देखा था और इतना समय हो गया ।

      हम सभी अपने सिर पर पैर रखकर स्वदेशी मंडपों की तरफ भागे । हिमाचल मंडप में हिमाचली संस्कृति के दर्शन किए । हरियाणा का मंडप बडा मनोहारी था । विभिन्न सामानों की प्रदर्शन लगी थी । वहीं हमने हरियाणवी खाने का आनंद लिया । लस्सी के साथ सरसों के साग ने मन आनंद से भर दिया । हरियाणा के बाद दिल्ली और पंजाब के मंडपों का भ्रमण किया । दिल्ली के मंडप में मिली-जुली संस्कृति के दर्शन हुए । दिल्ली के विकास की झलक मैं देखकर दंग रह गया । विशेषकर मेट्रो रेल के बारे में जनकर गर्व हुआ कि हम भी विदेशी तकनीकी ज्ञान में आगे नहीं , तो पीछे भी नहीं हैं ।

      हम रात हो गई पता ही नहीं चला । बहुत कुछ देखने की प्यास मन में लिए वापस आना पडा ।

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