Archive for the 'कविता' Category

कबीर की साखियाँ

August 25, 2009

गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दिया बताय॥
सिष को ऐसा चाहिए, गुरु को सब कुछ देय।
गुरु को ऐसा चाहिए, सिष से कुछ नहिं लेय॥
कबिरा संगत साधु की, ज्यों गंधी की बास।
जो कुछ गंधी दे नहीं, तौ भी बास सुबास॥
साधु तो ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ [...]

ग्राम श्री / सुमित्रानंदन पंत

August 25, 2009

फैली खेतों में दूर तलक
मख़मल की कोमल हरियाली,
लिपटीं जिस से रवि की किरणें
चाँदी की-सी उजली जाली !
रोमाँचित-सी लगती वसुधा
आयी जौ-गेहूँ में बाली
अरहर सनई की सोने की
किंकिणियाँ हैं शोभाशाली
उड़ती भीनी तैलाक्त गन्ध
फूली सरसों पीली-पीली,
लो, हरित धरा से झाँक रही
नीलम की कलि, तीसी नीली,
रँग-रँग के फूलों में रिलमिल
हँस रही संखिया मटर खड़ी,
मख़मली पेटियों-सी लटकी
छीमियाँ, छिपाये बीज लड़ी !

बच्चों की कविता चाँद के लिये एक झिंगोला/रामधीर सिंह दिनकर जी

July 22, 2009

चाँद के लिये एक झिंगोला
रामधीर सिंह दिनकर जी

 
 
 
एक दिन चाँद ने अपनी माता से कहा कि उसे ठंड लगती है इसलिये उसके लिये एक झिंगोला सिलवा दें. लेकिन उसकी माता के सामने समस्या यह है कि चाँद का आकार घटता-बढता रहता है तो वो नाप कैसे ले… पढिये रामधीर सिंह दिनकर जी की यह बाल-कविता [...]

कक्षा दस (बी स्तर) के छात्रों के लिए बिहारी की दोहे और व्याख्यान ।

July 18, 2007

बिहारी के दोहे
सोहत ओढैं पीतु पटु स्याम, सलौनैं गात ।
मनौ नीलमनि-सैल पर आपतु परयौ प्रभात ॥
भाव :- पीले वस्त्र धारण किए भगवान श्रीकृष्ण सुशोभित लग रहे हैं एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि पीले वस्त्र पहने कृष्ण इस वेश में ऐसे लग रहे है कि मनो प्रात:कालिन प्रभात नीलमणि पर्वत पर सूर्य की [...]

कबीर की प्रेम साधना

June 21, 2007

मध्यकालीन कवियों ने प्रेम को सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना था। समाज में व्याप्त क्यारियों को ध्वस्त करने के लिए इन कवियों ने प्रेम की शरण ली थी। कबीर साहब ने इस समस्त काल में प्रेम को प्रतिष्ठा प्रदान किया एवं शास्र- ज्ञान को तिरस्कार किया।
मासि कागद छूओं नहिं,
कलम गहयों नहिं हाथ।
कबीर साहब पहले भारतीय व [...]

रैदास के पद कक्षा नवमं के लिए

June 19, 2007

रैदास के पद
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी ।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी , जाकी अँग-अँग बास समानी ।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा , जैसे चितवत चंद चकोरा ।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती , जाकी जोति बरै दिन राती ।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा , जैसे सोनहिं मिलत सुहागा [...]

कबीर की साखी और व्याख्यान

June 5, 2007

 
 
 
साखी
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोइ ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौ सुख होइ ॥
व्याख्यान :- ऐसी वाणी बोलना चाहिए जिसमें मन का अहंकार न हो , ऐसी वाणी वक्ता के शरीर को शीतलता देती है और श्रोता को सुख प्रदान करती है ।
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि ।
ऐसी घटी घटी राँम [...]

पक्षी धाम श्रीरंगपट्टण्ण

April 5, 2007

 
गर्मियों का दिन आया है ।
कहीं नहीं दिखती पक्षियाँ ।
पर एक है स्थान वह श्रीरंगपटटण्ण ।
यहाँ है अन जानी कई पक्षियाँ ॥
देखो ना यह किसकी सृष्टि ।
निहारते ही रह जाती अपनी दृष्टि ।
एक या दो गिनते रह जाते ।
मुश्किल है जिसकी बयान करना ॥

सपनों की हवा

April 3, 2007

सोया रात भर सपनों की हवा में,
सोचता कैसा अजीब -सा है यह सपना,
निंद नही आती दिल को चुबानेवाला और डरानेवाल ।
                         जगके देखा सुन रहा हूँ बस हवा की आवाज,
                         ढुंढ्ता हूँ कहाँ सपनों की रानी मेरी जिसकी है तलाश अब मुझे ।